12.4.18

ईर्ष्या किससे करनी चाहिए


ईर्ष्या किससे करनी चाहिए ?
(ओशो )


किसी के वस्त्र देख लिए, ईर्ष्या हो गई।
किसी का मकान देख लिया, ईर्ष्या हो गई।
बना भी लोगे मकान तो कुछ न होगा। 

जिसका देखकर तुम्हें ईर्ष्या हुई है, जरा उसकी तरफ तो देखो, उसे क्या हो गया है?
कुछ भी नहीं हुआ। हो सकता है, तुमसे भी ज्यादा दीन—हीन अवस्था हो।

ईर्ष्या ही करनी हो 
तो उससे करो, 
जिसकी सारी ईर्ष्याएं खो गयीं !

यह हो सकता है कि तुम जिसका मकान देखकर ईर्ष्या कर रहे हो, वह तुम्हारा स्वास्थ्य देखकर ईर्ष्या कर रहा हो। सम्राट भी ईर्ष्या से भर जाते हैं।

मैंने सुना है, एक सम्राट का हाथी निकलता था। और एक जवान आदमी नें—एक फकीर था और एक मजार पर लेटा रहता था—उसकी पूंछ पकड़ ली और हाथी को रोक लिया। सोचो उस गरीब सम्राट की हैसियत! उसके प्राण कैप गए, सारा साम्राज्य मिट्टी हो गया। अचानक उस फकीर ने सम्राट को नपुंसक कर दिया। बड़ा दुखी हुआ। घर तो लौट आया, लेकिन बड़ा उदास हुआ। एक नंगा फकीर!

उसने किसी बुजुर्ग को पूछा कि क्या करें? कुछ करना पड़ेगा। यह तो निकलना बंद हो जाएगा। मैं गांव में निकलूंगा तो शर्म मालूम पड़ेगी। मैं हाथी पर हूं भला, मगर इसका क्या मतलब रहा? कोई आदमी पूंछ पकड़ ले हाथी की, हाथी न सरक सके, हम ऊपर अटके रह गए; महावत था, कुछ न कर पाया। उस बुजुर्ग ने कहा, घबड़ाओ मत। तुम ऐसा करो, खबर भेजो उस फकीर को कि तुझे एक रुपया रोज मिलेगा, सिर्फ मजार पर रोज शाम को छह बजे दीया जला दिया कर।

फकीर ने सोचा, यह तो अच्छा ही है; अभी मांगकर खाना पड़ता था, यह झंझट ही मिटी मांगकर खाने की, एक रुपया मिल जाएगा।

उन दिनों एक रुपया बड़ी बात थी, जागीर थी। एक रुपया तो एक महीने के लिए काफी था। उसने कहा कि यह तो बड़ा सौभाग्य हो गया। और कुल काम इतना है कि छह बजे दीया जला देना है। उसी मजार पर तो पड़े ही रहते हैं, तो उसमें झंझट भी क्या? उठकर जला देंगे।

महीने भर बाद, उस बुजुर्ग ने कहा, तुम फिर निकलना हाथी पर। महीने भर मत निकलो। महीने भर बाद निकला सम्राट। उस फकीर ने फिर पूंछ पकड़ी, लेकिन घिसट गया। सम्राट हैरान हुआ। उस बुजुर्ग से ईर्ष्या हुई उसे अब, कि यह आदमी बड़ा अदभुत जानकार है; न देखा इस आदमी को, न गया, बस बैठे—बैठे इतनी बात बता दी और कारगर हो गई! पूछा कि कैसे यह हुआ?

उसने कहा, सीधी सी बात है।
बेफिक्री उसकी मस्ती थी , उसकी ताकत थी; जरा सी फिक्र पैदा कर दी, मारा गया !

अब फिक्र लगी रहती है उसको, दिन में दो—चार दफे देख लेता है घड़ियाल की तरफ घंटाघर की—छह तो नहीं बज गए! क्योंकि चूक जाए, कहीं भूल जाए। कभी समय की फिक्र न की थी, बेसमय जीया था। तो जरा सी फिक्र डाल दी, चौबीस घंटे खटका बना रहता है। रात में सोता है तो भी खटका बना रहता है कि छह बजे जला देना है, एक रुपया मिलना है। 

और रुपए मिलने लगे तो गिनती करने लगा,जोड़ने लगा कि एक रुपए में तो महीने का काम हो जाएगा, बाकी तो उनतीस रुपए बच जाएंगे। साल में कितने होंगे, दस साल में कितने होंगे! महल बना लूंगा। 

पहले शांति से सोया रहता था, सपने भी न आते थे, अब बड़े सपने आने लगे। 

मार दिया जरा सी तरकीब से !!

ईर्ष्या ही करनी हो तो उनकी करना, जिनकी सारी ईर्ष्या खो गई।


ईर्ष्या मैं कुछ बुरा नहीं है।
गलत की ईर्ष्या मत करना,

क्योंकि गलत की ईर्ष्या करोगे तो गलत ही हो जाओगे। 


शुभ की ईर्ष्या करना,
मंगल की ईर्ष्या करना,
तो
जिसकी ईर्ष्या करोगे,
उसी तरफ यात्रा शुरू हो जाती है।

ईर्ष्या तो दिशासूचक है—
कहां जाना चाहते हो,
क्या होना चाहते हो!


ईर्ष्या में कुछ भी बुरा नहीं है।
द्वेष में भी कुछ बुरा नहीं है।
किसी चीज में कुछ बुरा नहीं है !
 बस, ठीक दिशा में सारी चीजों को संयोजित करने की बात है।

कांटे भी फूल हो जाते हैं, बस जरा सी समझ चाहिए।
फूल भी कांटे हो जाते हैं, बस जरा सी नासमझी काफी है !

( एस धम्‍मो सनंतनो )